الوصف
رسالة لطيفة مترجمة إلى اللغة الهندية، صنّفها الإمام المجدد محمد بن عبد الوهاب رحمه الله، قال في مُقدّمتها: «مِن أعجب العجاب، وأكبر الآيات الدالة على قدرة المللك الغلاب ستة أصول بيّنها الله تعالى بيانًا واضحًا للعوام فوق ما يظن الظانون، ثم بعد هذا غلط فيها كثيرٌ من أذكياء العالم وعقلاء بني آدم إلا أقل القليل». والأصول الستة هي: الأصل الأول: الإخلاص وبيان ضده، وهو الشرك. الأصل الثاني: الاجتماع في الدين، والنهي عن التفرق فيه. الأصل الثالث: السمع والطاعة لولاة الأمر. الأصل الرابع: بيان العلم والعلماء، والفقه والفقهاء، ومن تشبّه بهم وليس منهم. الأصل الخامس: بيان من هم أولياء الله. الأصل السادس: رد الشبهة التي وضعها الشيطان في ترك القرآن والسنة.
इस किताब के लेखक महान इस्लामी विद्वान इमाम मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब (उनपर अल्लाह की कृपा हो) फ़रमाते हैं
अल्लाह के नाम से (शुरू करता हूँ), जो बेहद दयालु एवं अनहद कृपालु है।
सर्वशक्तिमान बादशाह (अल्लाह) की क्षमता को प्रमाणित करने वाली सबसे बड़ी एवं आश्चर्यचकित करने वाली निशानियों में से वे छह सिद्धांत हैं, जिन्हें महान अल्लाह ने लोगों के अनुमान से भी अधिक स्पष्ट कर आम जनता के लिए बयान किया है, फिर भी कुछ लोगों के सिवाय बहुत-से बुद्धिमान तथा तेज़ दिमाग़ वाले लोग इनमें ग़लती कर बैठे।
केवल अल्लाह के लिए, जिसका कोई साझेदार नहीं, धर्म को विशुद्ध करना, शिर्क का वर्णन जो इसके विपरीत है एवं इस बात का उल्लेख कि क़ुरआन के अधिकतर भागों में विभिन्न शैलियों में इस सिद्धांत को इस प्रकार बयान किया गया है कि सामान्य लोगों में से सबसे कम बुद्धि वाला भी इसे समझ सकता है। फिर जब उम्मत के अधिकतर लोगों पर वह हालात आए, जो सबके सामने हैं और जिन्हें बयान करने की आवश्यकता नहीं है, तो शैतान ने सत्यनिष्ठा को सदाचारियों के अपमान तथा उनके अधिकारों के हनन के रूप में पेश किया औरशिर्क (बहु-ईश्वरवाद) को ,सदाचारी लोगों और उनके अनुयाइयों से प्रेम का स्वरूप देकर, उनके समक्ष प्रस्तुत किया ।
अल्लाह ने धर्म के मामले में एकमत होने का आदेश दिया है एवं धर्म में विभाजन का शिकार होने से रोका है। अल्लाह तआला ने इस विषय का इतनी अच्छी तरह से वर्णन किया है कि आम लोग भी समझ जाएं। अल्लाह ने हमें मना किया है कि हम पहली उम्मतों के उन लोगों की तरह हो जाएं, जो दलों में विभाजित होकर और विभेद का शिकार होकर बर्बाद हो गए। अल्लाह ने इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया है कि उसने मुसलमानों को धर्म के विषय में एकमत होने का आदेश दिया है एवं धर्म के मामले में सम्प्रदायों में विभाजित होने से उन्हें रोका है। इस विषय को, उन बेहद अचरज चीजों ,जो अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की हदीसों में इस बाबत पाई जाती हैं, के द्वारा और अधिक स्पष्ट कर दिया गया है।फिर हालत यह हो गई कि धर्म के मूल सिद्धांतों तथा दूसरे विषयों में मतभेद करने को ही धार्मिक ज्ञान और विवेक समझा जाने लगा एवं धर्म में एकता की बात करने वाले को पागल अथवा अधर्मी कहा जाने लगा।
अपने शासक का आज्ञापालन, चाहे वह कोई हबशी गुलाम ही क्यों न हो, उन चीज़ों में से है जिनसे एकता सम्पूर्ण होती है। अतः अल्लाह ने इस सिद्धांत को अलग-अलग अंदाज़ में बहुत ही स्पष्ट रूप से बयान किया है, धार्मिक दृष्टिकोण से भी और सांसारिक रूप से भी। फिर ज्ञान के अधिकांश दावेदारों के पास यह सिद्धांत ही अज्ञात हो गया, तो उसके अनुसार अमल की उम्मीद कैसे की जाती?!
ज्ञान एवं ज्ञानी, फिक़्ह एवं फुक़हा, तथा उन लोगों का बयान, जो इनका स्वांग भरते हैं, परंतु इनमें से होते नही हैं। अल्लाह ने इस सिद्धांत को सूरा अल-बक़रा के आरंभ ही में स्पष्ट कर दिया है, जिसका आरंभ अल्लाह के इस कथन से होता है:"ऐ इस्राईल की संतति! मेरे उस उपकार को याद करो, जो मैंने तुम पर किया तथा मुझसे किया गया वचन पूरा करो, मैं तुम्हें अपना दिया हुआ वचन पूरा करूँग।"सूरा अल- बक़रा, आयत संख्या- 40तथा जिसका अंत अल्लाह के इस कथन पर होता है:"ऐ इस्राईल की संतानो! मेरे उस उपकार को याद करो, जो मैंने तुम पर किया और ये कि तुम्हें संसार वासियों पर वरीयता दी थी।"सूरा अल- बक़रा, आयत संख्या- 47और हदीसों में तो इस बात का अधिक विस्तार मिलता है, जो इतनी साफ़ और सरल भाषा में है कि एक कम समझ रखने वाला आदमी भी समझ सकता है। फिर यह सिद्धांत सबसे अद्भुत वस्तु बन गया, ज्ञान और बुद्धि- विचार को स्वजनित धर्म- कर्म और नाना प्रकार की पथभ्रष्टता का नाम दे दिया गया और लोगों के पास जो सबसे अच्छी चीज़ रह गई, वह है सत्य को असत्य से मिश्रित कर देना।हाल यह हो गया कि जिस ज्ञान को अर्जित करना, अल्लाह ने लोगों पर अनिवार्य किया तथा उसकी प्रशंसा की, उसके अनुसार बात करने वाले को पागल अथवा अधर्मी कहा जाने लगा। जबकि जिसने उसका विरोध किया, उससे बैर रखा तथा उससे लोगों को डराने और रोकने के लिए पुस्तकें लिखी , वही ज्ञानी एवं फक़ीह बन गया।
अल्लाह तआला का अपने मित्रों का वर्णन एवं उन्हें कपटियों और पापियों से अलग करना, जो दरअसल हैं तो अल्लाह के शत्रु, पर अल्लाह के मित्रों जैसे दिखने का ढोंग करते हैं। इस संबंध में सूरा आल-ए-इमरान की यह आयत काफ़ी है:
"आप कह दें कि यदि तुम अल्लाह से प्रेम करते हो, तो मेरी बात मानो, अल्लाह तुमसे प्रेम करेगा।"
सूरा आल-ए-इमरान, आयत संख्या- 31
इसी तरह सूरा माइदा की यह आयत भी इस संदर्भ में काफ़ी है, जिसमें आया है:
"ऐ ईमान वालो! तुममें से जो अपने धर्म से फिर जाए, तो अल्लाह बहुत जल्द ऐसी जाति को लाएगा, जिससे अल्लाह प्रेम करेगा और वह भी अल्लाह से प्रेम करेगी।"
सूरा माइदा, आयत संख्या- 54
और सूरा यूनुस की यह आयत भी इस संदर्भ में काफ़ी है, जिसमें आया है::
"सुनो! जो अल्लाह के मित्र हैं, न उन्हें कोई भय होगा और न वे उदासीन होंगे।"
सूरा यूनुस, आयत संख्या- 62
लेकिन फिर ज्ञानी होने, सत्य मार्ग की ओर निर्देश देने और शरीयत के रक्षक होने का, दावा करने वालो में से अधिकांश लोगों की यह राय बन गई कि वली (अल्लाह का मित्र) होने के लिए रसूलों की अवज्ञा आवश्यक है। रसूलों की राह पर चलने वाला वली नहीं हो सकता। जिहाद छोड़ना भी ज़रूरी है। जिहाद करने वाले का शुमार वलियों में नहीं होता। इसी तरह ईमान और धर्मपरायणता से दूरी भी अनिवार्य है। अतः ईमान और धर्मपरायणता पर स्थिरता के साथ अग्रसर कोई व्यक्ति वली नहीं हो सकता। ऐ हमारे रब! हम तुझसे माफ़ी और सलामती की कामना करते हैं। निस्संदेह, तू दुआएँ सुनने वाला है।
उस संदेह का खंडन, जिसे शैतान ने क़ुरआन एवं हदीस को छोड़ विभिन्न मतों एवं मान्यताओं के अनुरसण के लिए घड़ लिया है। यानी यह कि क़ुरआन एवं हदीस को केवल मुजतहिद-ए-मुतलक़ ही समझ सकता है। फिर मुजतहिद होने के लिए ऐसी-ऐसी शर्तें रख दी जाती हैं, जो शायद अबू बक्र एवं उमर (रज़ियल्लाहु अनहुमा) के अंदर भी मौजूद नहीं थीं।
अब (इस संदेह के अनुसार) यदि इनसान के अंदर यह शर्तें न पाई जाएँ, तो वह कदापि क़ुरआन व हदीस को समझने का प्रयास न करे, तथा चूँकि क़ुरआन व हदीस को समझना बहुत ही कठिन कार्य है, इसलिए प्रत्यक्ष रूप से इन दोनों स्रोतों से मार्गदर्शन तलब करने वाला या तो पागल है या विधर्मी। अल्लाह पवित्र है और सारी प्रशंसाएँ उसी के लिए हैं कि उसने धार्मिक तथा सांसारिक हर तरह से इतने तरीक़ों से इस संदेह का खंडन किया है कि एक आम इनसान के लिए भी इसका समझना कुछ मुश्किल नहीं है। लेकिन, अब भी अधिकतर लोग इस वास्तविकता से अवगत नहीं हैं।
"उनमें से अकसर लोगों पर बात सिद्ध हो चुकी है। अतः वे ईमान नहीं लाते। हमने उनकी गर्दनों में बेड़ियाँ डाल दी हैं। फिर वे ठोड़ियों तक हैं, जिससे उनके सर ऊपर को उलट गए हैं। और हमने एक आड़ उनके सामने कर दी और एक आड़ उनके पीछे कर दी, जिससे हमने उनको ढाँक दिया, तो वे नहीं देख सकते। आप उनको डराएँ या न डराएँ, दोनों बराबर हैं। यह ईमान नहीं लाऐंगे। आप तो केवल ऐसे व्यक्ति को डरा सकते हैं, जो नसीहत पर चले और बिन देखे अत्यंत मेहरबान अल्लाह से डरे। अतः आप उसको माफ़ी और बहुत ही अच्छे विनिमय की शुभ सूचना सुना दें।"
सूरा या- सीन, आयत संख्या- 7-11
, यहाँ पर इस किताब का अंत हुता है। सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जो सारे जहानों का पालनहार है। अत्यधिक दरूद तथा शांति की धारा बरसे हमारे सरदार मुहम्मद तथा आपकी संतान- संतति एवं साथियों पर क़यामत के दिन तक।